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चुनी हुई सरकार ही चलाएगी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट
(Yogesh Gautam) Dainikkhabre.com Wednesday,04 July , 2018)

New Delhi News, 04 July 2018 :  दिल्ली की चुनी हुई सरकार और उपराज्यपाल के बीच शक्ति के बंटवारे को लेकर खींचातानी पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया है। शीर्ष अदालत ने अपनी अहम टिप्पणी में कहा है कि दिल्ली में कोई बॉस नहीं है। उपराज्यपाल को चुनी हुई सरकार की सिफारिशों के आधार पर काम करना होगा। हालांकि उसने यह भी साफ कर दिया कि दिल्ली एक पूर्ण राज्य नहीं है और अदालत इस मामले में कोई फैसला नहीं दे सकता। अदालत ने कहा कि उपराज्यपाल को अपने विवेक से काम करने या फैसला लेने का हक नहीं है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने कहा कि असली सत्ता और जवाबदेही चुनी हुई सरकार की है। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने पिछले साल दो नवंबर को इन अपीलों पर सुनवाई शुरू की थी जो छह दिसंबर , 2017 को पूरी हुई थी। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति ए के सीकरी, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण शामिल हैं।  आम आदमी पार्टी सरकार ने संविधान पीठ के समक्ष दलील दी थी कि उसके पास विधाई और कार्यपालिका दोनों के ही अधिकार हैं। उसने यह भी कहा था कि मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद के पास कोई भी कानून बनाने की विधाई शक्ति है, जबकि बनाए गए कानूनों को लागू करने के लिए उसके पास कार्यपालिका के अधिकार हैं। यही नहीं, आप सरकार का यह भी तर्क था कि उपराज्यपाल अनेक प्रशासनिक फैसले ले रहे हैं और ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित सरकार के सांविधानिक जनादेश को पूरा करने के लिये संविधान के अनुच्छेद 239 एए की व्याख्या जरूरी है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार की दलील थी कि दिल्ली सरकार पूरी तरह से प्रशासनिक अधिकार नहीं रख सकती। यह राष्ट्रीय हितों के खिलाफ होगा। इसके साथ ही उसने 1989 की बालकृष्णन समिति की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसने दिल्ली को एक राज्य का दर्जा नहीं दिए जाने के कारणों पर विचार किया। केंद्र का तर्क था कि दिल्ली सरकार ने अनेक गैरकानूनी अधिसूचनाएं जारी कीं और इन्हें उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी।  केन्द्र ने सुनवाई के दौरान संविधान, 1991 का दिल्ली की राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार कानून और राष्टूीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार के कामकाज के नियमों का हवाला देकर यह बताने का प्रयास किया कि राष्ट्रपति, केन्द्र सरकार और उपराज्यपाल को राष्ट्रीय राजधानी के प्रशासनिक मामले में प्राथमिकता प्राप्त है। इसके विपरीत, दिल्ली सरकार ने उपराज्यपाल पर लोकतंत्र को मखौल नाने का आरोप लगाया। उसने कहा कि वह या तो निर्वाचित सरकार फैसले ले रहे हैं अथवा बगैर किसी अधिकार के उसके फैसलों को बदल रहे हैं।

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